न तो शरीरकी अवश्य होनेवाली मृत्युका अभिनन्दन करे और न अनिश्चित जीवनका। केवल समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और नाशके कारण कालकी प्रतीक्षा करता रहे॥ ६॥
नाभिनन्देद् ध्रुवं मृत्युमध्रुवं वास्य जीवितम्।
कालं परं प्रतीक्षेत भूतानां प्रभवाप्ययम्॥ ६
न तो शरीरकी अवश्य होनेवाली मृत्युका अभिनन्दन करे और न अनिश्चित जीवनका। केवल समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और नाशके कारण कालकी प्रतीक्षा करता रहे॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.13.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 884) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/13/6/