शान्त, समदर्शी एवं महात्मा संन्यासीके लिये किसी आश्रमका बन्धन धर्मका कारण नहीं है। वह अपने आश्रमके चिह्नोंको धारण करे, चाहे छोड़ दे॥ ९॥
न यतेराश्रमः प्रायो धर्महेतुर्महात्मनः।
शान्तस्य समचित्तस्य बिभृयादुत वा त्यजेत्॥ ९
शान्त, समदर्शी एवं महात्मा संन्यासीके लिये किसी आश्रमका बन्धन धर्मका कारण नहीं है। वह अपने आश्रमके चिह्नोंको धारण करे, चाहे छोड़ दे॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.13.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 884) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/13/9/