॥ श्रीहरिः ॥
शृण्वन्भगवतोऽभीक्ष्णमवतारकथामृतम्।
श्रद्दधानो यथाकालमुपशान्तजनावृतः॥ ३
śṛṇvanbhagavato'bhīkṣṇamavatārakathāmṛtam|
śraddadhāno yathākālamupaśāntajanāvṛtaḥ|| 3
अर्थ
अवकाशके अनुसार विरक्त पुरुषोंमें निवास करे और बार-बार श्रद्धापूर्वक भगवान्के अवतारोंकी लीला-सुधाका पान करता रहे॥ ३॥
शृण्वन्भगवतोऽभीक्ष्णमवतारकथामृतम्।
श्रद्दधानो यथाकालमुपशान्तजनावृतः॥ ३
अवकाशके अनुसार विरक्त पुरुषोंमें निवास करे और बार-बार श्रद्धापूर्वक भगवान्के अवतारोंकी लीला-सुधाका पान करता रहे॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.14.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 889) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/14/3/