श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.33

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

एते पुण्यतमा देशा हरेरर्चाश्रिताश्‍च ये।

एतान्देशान् निषेवेत श्रेयस्कामो ह्यभीक्ष्णशः।

धर्मो ह्यत्रेहितः पुंसां सहस्राधिफलोदयः॥ ३३

ete puṇyatamā deśā harerarcāśritāśca ye|

etāndeśān niṣeveta śreyaskāmo hyabhīkṣṇaśaḥ|

dharmo hyatrehitaḥ puṃsāṃ sahasrādhiphalodayaḥ|| 33

अर्थ

पुष्कर आदि सरोवर, सिद्ध पुरुषोंके द्वारा सेवित क्षेत्र, कुरुक्षेत्र, गया, प्रयाग, पुलहाश्रम (शालग्राम क्षेत्र), नैमिषारण्य, फाल्गुनक्षेत्र, सेतुबन्ध, प्रभास, द्वारका, काशी, मथुरा, पम्पासर, बिन्दुसरोवर, बदरिकाश्रम, अलकनन्दा, भगवान् सीतारामजीके आश्रम—अयोध्या, चित्रकूटादि, महेन्द्र और मलय आदि समस्त कुलपर्वत और जहाँ-जहाँ भगवान्‌के अर्चावतार हैं—वे सब-के-सब देश अत्यन्त पवित्र हैं। कल्याणकामी पुरुषको बार-बार इन देशोंका सेवन करना चाहिये। इन स्थानोंपर जो पुण्यकर्म किये जाते हैं, मनुष्योंको उनका हजारगुना फल मिलता है॥ ३०—३३॥

यह अर्थ श्लोक 30–33 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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