अभी तुम्हारे इसी यज्ञकी बात है; देवता, ऋषि, सिद्ध और सनकादिकोंके रहनेपर भी अग्रपूजाके लिये भगवान् श्रीकृष्णको ही पात्र समझा गया॥ ३५॥
देवर्ष्यर्हत्सु वै सत्सु तत्र ब्रह्मात्मजादिषु।
राजन्यदग्रपूजायां मतः पात्रतयाच्युतः॥ ३५
अभी तुम्हारे इसी यज्ञकी बात है; देवता, ऋषि, सिद्ध और सनकादिकोंके रहनेपर भी अग्रपूजाके लिये भगवान् श्रीकृष्णको ही पात्र समझा गया॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.14.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 892) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/14/35/