श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.35

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

देवर्ष्यर्हत्सु वै सत्सु तत्र ब्रह्मात्मजादिषु।

राजन्यदग्रपूजायां मतः पात्रतयाच्युतः॥ ३५

devarṣyarhatsu vai satsu tatra brahmātmajādiṣu|

rājanyadagrapūjāyāṃ mataḥ pātratayācyutaḥ|| 35

अर्थ

अभी तुम्हारे इसी यज्ञकी बात है; देवता, ऋषि, सिद्ध और सनकादिकोंके रहनेपर भी अग्रपूजाके लिये भगवान् श्रीकृष्णको ही पात्र समझा गया॥ ३५॥

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