श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.14.42

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

नन्वस्य ब्राह्मणा राजन्कृष्णस्य जगदात्मनः।

पुनन्तः पादरजसा त्रिलोकीं दैवतं महत्॥ ४२

nanvasya brāhmaṇā rājankṛṣṇasya jagadātmanaḥ|

punantaḥ pādarajasā trilokīṃ daivataṃ mahat|| 42

अर्थ

महाराज! हमारी और तुम्हारी तो बात ही क्या—ये जो सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्ण हैं, इनके भी इष्टदेव ब्राह्मण ही हैं। क्योंकि उनके चरणोंकी धूलसे तीनों लोक पवित्र होते रहते हैं॥ ४२॥✎ 643 644

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे सदाचारनिर्णयो नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #643 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #644 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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