श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.14

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यस्त्विच्छया कृतः पुम्भिराभासो ह्याश्रमात् पृथक्।

स्वभावविहितो धर्मः कस्य नेष्टः प्रशान्तये॥ १४

yastvicchayā kṛtaḥ pumbhirābhāso hyāśramāt pṛthak|

svabhāvavihito dharmaḥ kasya neṣṭaḥ praśāntaye|| 14

अर्थ

मनुष्य अपने आश्रमके विपरीत स्वेच्छासे जिसे धर्म मान लेता है, वह ‘आभास’ है। अपने-अपने स्वभावके अनुकूल जो वर्णाश्रमोचित धर्म हैं, वे भला किसे शान्ति नहीं देते॥ १४॥✎ 1617

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1617 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निवृत्ति-परायण → निवृत्तिपरायण

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