मनुष्य अपने आश्रमके विपरीत स्वेच्छासे जिसे धर्म मान लेता है, वह ‘आभास’ है। अपने-अपने स्वभावके अनुकूल जो वर्णाश्रमोचित धर्म हैं, वे भला किसे शान्ति नहीं देते॥ १४॥✎ 1617
यस्त्विच्छया कृतः पुम्भिराभासो ह्याश्रमात् पृथक्।
स्वभावविहितो धर्मः कस्य नेष्टः प्रशान्तये॥ १४
मनुष्य अपने आश्रमके विपरीत स्वेच्छासे जिसे धर्म मान लेता है, वह ‘आभास’ है। अपने-अपने स्वभावके अनुकूल जो वर्णाश्रमोचित धर्म हैं, वे भला किसे शान्ति नहीं देते॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.15.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 895) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/15/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)