श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.2

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

ज्ञाननिष्ठाय देयानि कव्यान्यानन्त्यमिच्छता।

दैवे च तदभावे स्यादितरेभ्यो यथार्हतः॥ २

jñānaniṣṭhāya deyāni kavyānyānantyamicchatā|

daive ca tadabhāve syāditarebhyo yathārhataḥ|| 2

अर्थ

गृहस्थ पुरुषको चाहिये कि श्राद्ध अथवा देवपूजाके अवसरपर अपने कर्मका अक्षय फल प्राप्त करनेके लिये ज्ञाननिष्ठ पुरुषको ही हव्य-कव्यका दान करे। यदि वह न मिले तो योगी, प्रवचनकार आदिको यथायोग्य और यथाक्रम देना चाहिये॥ २॥

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