॥ श्रीहरिः ॥
प्राणापानौ सन्निरुन्ध्यात् पूरकुम्भकरेचकैः।
यावन्मनस्त्यजेत् कामान् स्वनासाग्रनिरीक्षणः॥ ३२
prāṇāpānau sannirundhyāt pūrakumbhakarecakaiḥ|
yāvanmanastyajet kāmān svanāsāgranirīkṣaṇaḥ|| 32
अर्थ
जबतक मन संकल्प-विकल्पोंको छोड़ न दे, तबतक नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाकर पूरक, कुम्भक और रेचकद्वारा प्राण तथा अपानकी गतिको रोके॥ ३२॥
प्राणापानौ सन्निरुन्ध्यात् पूरकुम्भकरेचकैः।
यावन्मनस्त्यजेत् कामान् स्वनासाग्रनिरीक्षणः॥ ३२
जबतक मन संकल्प-विकल्पोंको छोड़ न दे, तबतक नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाकर पूरक, कुम्भक और रेचकद्वारा प्राण तथा अपानकी गतिको रोके॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.15.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 897) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/15/32/