श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.46

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

नो चेत् प्रमत्तमसदिन्द्रियवाजिसूता

नीत्वोत्पथं विषयदस्युषु निक्षिपन्ति।

ते दस्यवः सहयसूतममुं तमोऽन्धे

संसारकूप उरुमृत्युभये क्षिपन्ति॥ ४६

no cet pramattamasadindriyavājisūtā

nītvotpathaṃ viṣayadasyuṣu nikṣipanti|

te dasyavaḥ sahayasūtamamuṃ tamo'ndhe

saṃsārakūpa urumṛtyubhaye kṣipanti|| 46

अर्थ

नहीं तो, तनिक भी प्रमाद हो जानेपर ये इन्द्रियरूप दुष्ट घोड़े और उनसे मित्रता रखनेवाला बुद्धिरूप सारथि रथके स्वामी जीवको उलटे रास्ते ले जाकर विषयरूपी लुटेरोंके हाथोंमें डाल देंगे। वे डाकू सारथि और घोड़ोंके सहित इस जीवको मृत्युसे अत्यन्त भयावने घोर अन्धकारमय संसारके कुएँमें गिरा देंगे॥ ४६॥

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