श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.55

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

देवयानमिदं प्राहुर्भूत्वा भूत्वानुपूर्वशः।

आत्मयाज्युपशान्तात्मा ह्यात्मस्थो न निवर्तते॥ ५५

devayānamidaṃ prāhurbhūtvā bhūtvānupūrvaśaḥ|

ātmayājyupaśāntātmā hyātmastho na nivartate|| 55

अर्थ

इसे ‘देवयान’ मार्ग कहते हैं। इस मार्गसे जानेवाला आत्मोपासक संसारकी ओरसे निवृत्त होकर क्रमशः एकसे दूसरे देवताके पास होता हुआ ब्रह्मलोकमें जाकर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। वह प्रवृत्तिमार्गीके समान फिर जन्म-मृत्युके चक्करमें नहीं पड़ता॥ ५५॥✎ 1620

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1620 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: होने-वाले → होनेवाले

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