पृथ्वी आदि पंचभूतोंसे इस शरीरका निर्माण नहीं हुआ है। वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो न तो वह उन पंचभूतोंका संघात है और न विकार या परिणाम ही। क्योंकि यह अपने अवयवोंसे न तो पृथक् है और न उनमें अनुगत ही है, अतएव मिथ्या है॥ ५९॥✎ 1998
क्षित्यादीनामिहार्थानां छाया न कतमापि हि।
न संघातो विकारोऽपि न पृथङ्नान्वितो मृषा॥ ५९
पृथ्वी आदि पंचभूतोंसे इस शरीरका निर्माण नहीं हुआ है। वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो न तो वह उन पंचभूतोंका संघात है और न विकार या परिणाम ही। क्योंकि यह अपने अवयवोंसे न तो पृथक् है और न उनमें अनुगत ही है, अतएव मिथ्या है॥ ५९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.15.59 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 901) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/15/59/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1998 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): भोगरूपसे → भोग्यरूपसे