जैसे वस्त्र सूतरूप ही होता है, वैसे ही कार्य भी कारणमात्र ही है। क्योंकि भेद तो वास्तवमें है नहीं। इस प्रकार सबकी एकताका विचार ‘भावाद्वैत’ है॥ ६३॥
कार्यकारणवस्त्वैक्यमर्शनं पटतन्तुवत्।
अवस्तुत्वाद् विकल्पस्य भावाद्वैतं तदुच्यते॥ ६३
जैसे वस्त्र सूतरूप ही होता है, वैसे ही कार्य भी कारणमात्र ही है। क्योंकि भेद तो वास्तवमें है नहीं। इस प्रकार सबकी एकताका विचार ‘भावाद्वैत’ है॥ ६३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.15.63 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 902) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/15/63/