श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.74

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

धर्मस्ते गृहमेधीयो वर्णितः पापनाशनः।

गृहस्थो येन पदवीमञ्जसा न्यासिनामियात्॥ ७४

dharmaste gṛhamedhīyo varṇitaḥ pāpanāśanaḥ|

gṛhastho yena padavīmañjasā nyāsināmiyāt|| 74

अर्थ

संतोंकी अवहेलना और सेवाका यह मेरा प्रत्यक्ष अनुभव है। संत-सेवासे ही भगवान् प्रसन्‍न होते हैं। मैंने तुम्हें गृहस्थोंका पापनाशक धर्म बतला दिया। इस धर्मके आचरणसे गृहस्थ भी अनायास ही संन्यासियोंको मिलनेवाला परमपद प्राप्त कर लेता है॥ ७४॥✎ 647 648

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #647 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #648 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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