श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.76

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

स वा अयं ब्रह्म महद्विमृग्यं

कैवल्यनिर्वाणसुखानुभूतिः ।

प्रियः सुहृद‍् वः खलु मातुलेय

आत्मार्हणीयो विधिकृद् गुरुश्‍च॥ ७६

sa vā ayaṃ brahma mahadvimṛgyaṃ

kaivalyanirvāṇasukhānubhūtiḥ |

priyaḥ suhṛd vaḥ khalu mātuleya

ātmārhaṇīyo vidhikṛd guruśca|| 76

अर्थ

बड़े-बड़े महापुरुष निरन्तर जिनको ढूँढ़ते रहते हैं, जो मायाके लेशसे रहित परम शान्त परमानन्दानुभव-स्वरूप परब्रह्म परमात्मा हैं—वे ही तुम्हारे प्रिय, हितैषी, ममेरे भाई, पूज्य, आज्ञाकारी, गुरु और स्वयं आत्मा श्रीकृष्ण हैं॥ ७६॥✎ 1956

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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