श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.15.8

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

नैतादृशः परो धर्मो नृणां सद्धर्ममिच्छताम्।

न्यासो दण्डस्य भूतेषु मनोवाक्कायजस्य३ यः॥ ८

naitādṛśaḥ paro dharmo nṛṇāṃ saddharmamicchatām|

nyāso daṇḍasya bhūteṣu manovākkāyajasya yaḥ|| 8

अर्थ

जो लोग सद्धर्मपालनकी अभिलाषा रखते हैं, उनके लिये इससे बढ़कर और कोई धर्म नहीं है कि किसी भी प्राणीको मन, वाणी और शरीरसे किसी प्रकारका कष्ट न दिया जाय॥ ८॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—क्कायकर्मभिः।

    (मुद्रित पृष्ठ 894)

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