श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.2.53

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

अहो अकरुणो देवः स्त्रियाऽऽकरुणया विभुः।

कृपणं मानुशोचन्त्या दीनया किं करिष्यति॥ ५३

aho akaruṇo devaḥ striyā''karuṇayā vibhuḥ|

kṛpaṇaṃ mānuśocantyā dīnayā kiṃ kariṣyati|| 53

अर्थ

उसने कहा—‘यों तो विधाता सब कुछ कर सकता है। परन्तु है वह बड़ा निर्दयी। यह मेरी सहचरी एक तो स्त्री है, दूसरे मुझ अभागेके लिये शोक करती हुई बड़ी दीनतासे छटपटा रही है। इसे लेकर वह करेगा क्या॥ ५३॥✎ 2020

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2020 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें