श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.3.29

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

त्वमीशिषे जगतस्तस्थुषश्‍च

प्राणेन मुख्येन पतिः प्रजानाम्।

चित्तस्य चित्तेर्मनइन्द्रियाणां

पतिर्महान् भूतगुणाशयेशः॥ २९

tvamīśiṣe jagatastasthuṣaśca

prāṇena mukhyena patiḥ prajānām|

cittasya cittermanaïndriyāṇāṃ

patirmahān bhūtaguṇāśayeśaḥ|| 29

अर्थ

आप मुख्यप्राण सूत्रात्माके रूपसे चराचर जगत‍्को अपने नियन्त्रणमें रखते हैं। आप ही प्रजाके रक्षक भी हैं। भगवन्! चित्त, चेतना, मन और इन्द्रियोंके स्वामी आप ही हैं। पंचभूत, शब्दादि विषय और उनके संस्कारोंके रचयिता भी महत्तत्त्वके रूपमें आप ही हैं॥ २९॥

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