श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.3.32

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

त्वत्तः परं नापरमप्यनेज-

देजच्च किञ्चिद् व्यतिरिक्तमस्ति।

विद्याः कलास्ते तनवश्‍च सर्वा

हिरण्यगर्भोऽसि बृहत्त्रिपृष्ठः॥ ३२

tvattaḥ paraṃ nāparamapyaneja-

dejacca kiñcid vyatiriktamasti|

vidyāḥ kalāste tanavaśca sarvā

hiraṇyagarbho'si bṛhattripṛṣṭhaḥ|| 32

अर्थ

प्रभो! कार्य, कारण, चल और अचल ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो आपसे भिन्‍न हो। समस्त विद्या और कलाएँ आपके शरीर हैं। आप त्रिगुणमयी मायासे अतीत स्वयं ब्रह्म हैं। यह स्वर्णमय ब्रह्माण्ड आपके गर्भमें स्थित है। आप इसे अपनेमेंसे ही प्रकट करते हैं॥ ३२॥

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