श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.3.4

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तस्य मूर्ध्नः समुद‍्भूतः सधूमोऽग्‍निस्तपोमयः।

तिर्यगूर्ध्वमधोलोकानतपद्विष्वगीरितः ॥ ४

tasya mūrdhnaḥ samudbhūtaḥ sadhūmo'gnistapomayaḥ|

tiryagūrdhvamadholokānatapadviṣvagīritaḥ || 4

अर्थ

बहुत दिनोंतक तपस्या करनेके बाद उसकी तपस्याकी आग धूएँके साथ सिरसे निकलने लगी। वह चारों ओर फैल गयी और ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलके लोकोंको जलाने लगी॥ ४॥

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