बहुत दिनोंतक तपस्या करनेके बाद उसकी तपस्याकी आग धूएँके साथ सिरसे निकलने लगी। वह चारों ओर फैल गयी और ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलके लोकोंको जलाने लगी॥ ४॥
तस्य मूर्ध्नः समुद्भूतः सधूमोऽग्निस्तपोमयः।
तिर्यगूर्ध्वमधोलोकानतपद्विष्वगीरितः ॥ ४
बहुत दिनोंतक तपस्या करनेके बाद उसकी तपस्याकी आग धूएँके साथ सिरसे निकलने लगी। वह चारों ओर फैल गयी और ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलके लोकोंको जलाने लगी॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.3.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 819) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/3/4/