श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.3.6

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तेन तप्ता दिवं त्यक्‍त्वा ब्रह्मलोकं ययुः सुराः।

धात्रे विज्ञापयामासुर्देवदेव जगत्पते॥ ६

tena taptā divaṃ tyaktvā brahmalokaṃ yayuḥ surāḥ|

dhātre vijñāpayāmāsurdevadeva jagatpate|| 6

अर्थ

हिरण्यकशिपुकी उस तपोमयी आगकी लपटोंसे स्वर्गके देवता भी जलने लगे। वे घबराकर स्वर्गसे ब्रह्मलोकमें गये और ब्रह्माजीसे प्रार्थना करने लगे—‘हे देवताओंके भी आराध्यदेव जगत्पति ब्रह्माजी! हमलोग हिरण्यकशिपुके तपकी ज्वालासे जल रहे हैं। अब हम स्वर्गमें नहीं रह सकते। हे अनन्त! हे सर्वाध्यक्ष! यदि आप उचित समझें तो अपनी सेवा करनेवाली जनताका नाश होनेके पहले ही यह ज्वाला शान्त कर दीजिये॥ ६-७॥

यह अर्थ श्लोक 6–7 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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