श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.16

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

अकृष्टपच्या तस्यासीत् सप्तद्वीपवती मही।

तथा कामदुघा द्यौस्तु नानाश्‍चर्यपदं नभः॥ १६

akṛṣṭapacyā tasyāsīt saptadvīpavatī mahī|

tathā kāmadughā dyaustu nānāścaryapadaṃ nabhaḥ|| 16

अर्थ

पृथ्वीके सातों द्वीपोंमें उसका अखण्ड राज्य था। सभी जगह बिना ही जोते-बोये धरतीसे अन्‍न पैदा होता था। वह जो कुछ चाहता, अन्तरिक्षसे उसे मिल जाता तथा आकाश उसे भाँति-भाँतिकी आश्‍चर्यजनक वस्तुएँ दिखा-दिखाकर उसका मनोरंजन करता था॥ १६॥

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