॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.4.33
नोद्विग्नचित्तो व्यसनेषु निःस्पृहः
श्रुतेषु दृष्टेषु गुणेष्ववस्तुदृक्।
दान्तेन्द्रियप्राणशरीरधीः सदा
प्रशान्तकामो रहितासुरोऽसुरः॥ ३३
nodvignacitto vyasaneṣu niḥspṛhaḥ
śruteṣu dṛṣṭeṣu guṇeṣvavastudṛk|
dāntendriyaprāṇaśarīradhīḥ sadā
praśāntakāmo rahitāsuro'suraḥ|| 33
अर्थ
बड़े-बड़े दुःखोंमें भी वे तनिक भी घबराते न थे। लोक-परलोकके विषयोंको उन्होंने देखा-सुना तो बहुत था, परन्तु वे उन्हें निःसार और असत्य समझते थे। इसलिये उनके मनमें किसी भी वस्तुकी लालसा न थी। इन्द्रिय, प्राण, शरीर और मन उनके वशमें थे। उनके चित्तमें कभी किसी प्रकारकी कामना नहीं उठती थी। जन्मसे असुर होनेपर भी उनमें आसुरी सम्पत्तिका लेश भी नहीं था॥ ३३॥