युधिष्ठिर! प्रह्लाद बचपनमें ही खेल-कूद छोड़कर भगवान्के ध्यानमें जडवत् तन्मय हो जाया करते। भगवान् श्रीकृष्णके अनुग्रहरूप ग्रहने उनके हृदयको इस प्रकार खींच लिया था कि उन्हें जगत्की कुछ सुध-बुध ही न रहती॥ ३७॥
न्यस्तक्रीडनको बालो जडवत्तन्मनस्तया।
कृष्णग्रहगृहीतात्मा न वेद जगदीदृशम्॥ ३७
युधिष्ठिर! प्रह्लाद बचपनमें ही खेल-कूद छोड़कर भगवान्के ध्यानमें जडवत् तन्मय हो जाया करते। भगवान् श्रीकृष्णके अनुग्रहरूप ग्रहने उनके हृदयको इस प्रकार खींच लिया था कि उन्हें जगत्की कुछ सुध-बुध ही न रहती॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.4.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 827) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/4/37/