युधिष्ठिर! प्रह्लाद भगवान्के परम प्रेमी भक्त, परम भाग्यवान् और ऊँची कोटिके महात्मा थे। हिरण्यकशिपु ऐसे साधु पुत्रको भी अपराधी बतलाकर उनका अनिष्ट करनेकी चेष्टा करने लगा॥ ४३॥
तस्मिन्महाभागवते महाभागे महात्मनि।
हिरण्यकशिपू राजन्नकरोदघमात्मजे॥ ४३
युधिष्ठिर! प्रह्लाद भगवान्के परम प्रेमी भक्त, परम भाग्यवान् और ऊँची कोटिके महात्मा थे। हिरण्यकशिपु ऐसे साधु पुत्रको भी अपराधी बतलाकर उनका अनिष्ट करनेकी चेष्टा करने लगा॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.4.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 828) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/4/43/