श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.4.5

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

स विजित्य दिशः सर्वा लोकांश्‍च त्रीन् महासुरः।

देवासुरमनुष्येन्द्रान् गन्धर्वगरुडोरगान्॥ ५

sa vijitya diśaḥ sarvā lokāṃśca trīn mahāsuraḥ|

devāsuramanuṣyendrān gandharvagaruḍoragān|| 5

अर्थ

उस महादैत्यने समस्त दिशाओं, तीनों लोकों तथा देवता, असुर, नरपति, गन्धर्व, गरुड़, सर्प, सिद्ध, चारण, विद्याधर, ऋषि, पितरोंके अधिपति, मनु, यक्ष, राक्षस, पिशाचराज, प्रेत, भूतपति एवं समस्त प्राणियोंके राजाओंको जीतकर अपने वशमें कर लिया। यहाँतक कि उस विश्‍व-विजयी दैत्यने लोकपालोंकी शक्ति और स्थान भी छीन लिये॥ ५—७॥✎ 581 2021

यह अर्थ श्लोक 5–7 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #581 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #2021 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि

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