युधिष्ठिर! हिरण्यकशिपुने प्रसन्नमुख प्रह्लादको अपनी गोदमें बैठाकर उनका सिर सूँघा। उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू गिर-गिरकर प्रह्लादके शरीरको भिगोने लगे। उसने अपने पुत्रसे पूछा॥ २१॥
आरोप्याङ्कमवघ्राय मूर्धन्यश्रुकलाम्बुभिः।
आसिञ्चन् विकसद्वक्त्रमिदमाह युधिष्ठिर॥ २१
युधिष्ठिर! हिरण्यकशिपुने प्रसन्नमुख प्रह्लादको अपनी गोदमें बैठाकर उनका सिर सूँघा। उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू गिर-गिरकर प्रह्लादके शरीरको भिगोने लगे। उसने अपने पुत्रसे पूछा॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.5.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 831) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/5/21/