प्रह्लादकी यह बात सुनते ही क्रोधके मारे हिरण्यकशिपुके ओठ फड़कने लगे। उसने गुरुपुत्रसे कहा—॥ २५॥✎ 5881958
निशम्यैतत्सुतवचो हिरण्यकशिपुस्तदा।
गुरुपुत्रमुवाचेदं रुषा प्रस्फुरिताधरः॥ २५
प्रह्लादकी यह बात सुनते ही क्रोधके मारे हिरण्यकशिपुके ओठ फड़कने लगे। उसने गुरुपुत्रसे कहा—॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.5.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 831) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/5/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#588 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् की → विष्णुभगवान्की
#1958 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): परवाह → परवा