श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.29

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नारद उवाच

गुरुणैवं प्रतिप्रोक्तो भूय आहासुरः सुतम्।

न चेद‍्गुरुमुखीयं ते कुतोऽभद्रासती मतिः॥ २९

guruṇaivaṃ pratiprokto bhūya āhāsuraḥ sutam|

na cedgurumukhīyaṃ te kuto'bhadrāsatī matiḥ|| 29

अर्थ

नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! जब गुरुजीने ऐसा उत्तर दिया, तब हिरण्यकशिपुने फिर प्रह्लादसे पूछा—‘क्यों रे! यदि तुझे ऐसी अहित करनेवाली खोटी बुद्धि गुरुमुखसे नहीं मिली तो बता, कहाँसे प्राप्त हुई?’॥ २९॥

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