॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.5.40
नदन्तो भैरवान्नादांश्छिन्धि भिन्धीति वादिनः।
आसीनं चाहनन् शूलैः प्रह्रादं सर्वमर्मसु॥ ४०
nadanto bhairavānnādāṃśchindhi bhindhīti vādinaḥ|
āsīnaṃ cāhanan śūlaiḥ prahrādaṃ sarvamarmasu|| 40
अर्थ
जब हिरण्यकशिपुने दैत्योंको इस प्रकार आज्ञा दी, तब तीखी दाढ़, विकराल वदन, लाल-लाल दाढ़ी-मूँछ एवं केशोंवाले दैत्य हाथोंमें त्रिशूल ले-लेकर ‘मारो, काटो’—इस प्रकार बड़े जोरसे चिल्लाने लगे। प्रह्लाद चुपचाप बैठे हुए थे और दैत्य उनके सभी मर्मस्थानोंमें शूलसे घाव कर रहे थे॥ ३९-४०॥