धर्मा ह्यस्योपदेष्टव्या राज्ञां ये गृहमेधिनाम्॥ ५१
tatheti guruputroktamanujñāyedamabravīt|
dharmā hyasyopadeṣṭavyā rājñāṃ ye gṛhamedhinām|| 51
अर्थ
हिरण्यकशिपुने ‘अच्छा, ठीक है’ कहकर गुरुपुत्रोंकी सलाह मान ली और कहा कि ‘इसे उन धर्मोंका उपदेश करना चाहिये, जिनका पालन गृहस्थ नरपति किया करते हैं’॥ ५१॥
तथेति गुरुपुत्रोक्तमनुज्ञायेदमब्रवीत्।
धर्मा ह्यस्योपदेष्टव्या राज्ञां ये गृहमेधिनाम्॥ ५१
हिरण्यकशिपुने ‘अच्छा, ठीक है’ कहकर गुरुपुत्रोंकी सलाह मान ली और कहा कि ‘इसे उन धर्मोंका उपदेश करना चाहिये, जिनका पालन गृहस्थ नरपति किया करते हैं’॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.5.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 835) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/5/51/