श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.6.12

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

पुत्रान्स्मरंस्ता दुहितॄर्हृदय्या१

भ्रातॄन् स्वसॄर्वा पितरौ च दीनौ।

गृहान् मनोज्ञोरुपरिच्छदांश्‍च

वृत्तीश्‍च कुल्याः पशुभृत्यवर्गान्॥ १२✎ 1103

putrānsmaraṃstā duhitṝrhṛdayyā

bhrātṝn svasṝrvā pitarau ca dīnau|

gṛhān manojñoruparicchadāṃśca

vṛttīśca kulyāḥ paśubhṛtyavargān|| 12

अर्थ

जो अपनी ससुराल गयी हुई प्रिय पुत्रियों, पुत्रों, भाई-बहिनों और दीन अवस्थाको प्राप्त पिता-माता, बहुत-सी सुन्दर-सुन्दर बहुमूल्य सामग्रियोंसे सजे हुए घरों, कुलपरम्परागत जीविकाके साधनों तथा पशुओं और सेवकोंके निरन्तर स्मरणमें रम गया है, वह भला-उन्हें कैसे छोड़ सकता है॥ १२॥✎ 1988

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—दुहितॄश्‍च स्वसॄर्भ्रातॄन् कलत्रान् पित०।

    (मुद्रित पृष्ठ 838)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1103 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): १ → १२
  • #1988 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): गवाँ → गँवा

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