श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.6.21

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

गुणेषु गुणसाम्ये च गुणव्यतिकरे तथा३।

एक एव परो ह्यात्मा भगवानीश्‍वरोऽव्ययः॥ २१

guṇeṣu guṇasāmye ca guṇavyatikare tathā|

eka eva paro hyātmā bhagavānīśvaro'vyayaḥ|| 21

अर्थ

ब्रह्मासे लेकर तिनकेतक छोटे-बड़े समस्त प्राणियोंमें, पंचभूतोंसे बनी हुई वस्तुओंमें, पंचभूतोंमें, सूक्ष्म तन्मात्राओंमें, महत्तत्त्वमें, तीनों गुणोंमें और गुणोंकी साम्यावस्था प्रकृतिमें एक ही अविनाशी परमात्मा विराजमान हैं। वे ही समस्त सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्‍वर्योंकी खान हैं॥ २०-२१॥

यह अर्थ श्लोक 20–21 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—यथा।

    (मुद्रित पृष्ठ 839)

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