॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.6.25
तुष्टे च तत्र किमलभ्यमनन्त आद्ये
किं तैर्गुणव्यतिकरादिह ये स्वसिद्धाः।
धर्मादयः किमगुणेन च काङ्क्षितेन
सारंजुषां चरणयोरुपगायतां नः॥ २५
tuṣṭe ca tatra kimalabhyamananta ādye
kiṃ tairguṇavyatikarādiha ye svasiddhāḥ|
dharmādayaḥ kimaguṇena ca kāṅkṣitena
sāraṃjuṣāṃ caraṇayorupagāyatāṃ naḥ|| 25
अर्थ
आदिनारायण अनन्तभगवान्के प्रसन्न हो जानेपर ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो नहीं मिल जाती? लोक और परलोकके लिये जिन धर्म, अर्थ आदिकी आवश्यकता बतलायी जाती है—वे तो गुणोंके परिणामसे बिना प्रयासके स्वयं ही मिलनेवाले हैं। जब हम श्रीभगवान्के चरणामृतका सेवन करने और उनके नाम-गुणोंका कीर्तन करनेमें लगे हैं, तब हमें मोक्षकी भी क्या आवश्यकता है॥ २५॥