श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.11

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

दस्यून्पुरा षण्ण विजित्य लुम्पतो

मन्यन्त एके स्वजिता दिशो दश।

जितात्मनो ज्ञस्य समस्य देहिनां

साधोः स्वमोहप्रभवाः कुतः परे॥ ११

dasyūnpurā ṣaṇṇa vijitya lumpato

manyanta eke svajitā diśo daśa|

jitātmano jñasya samasya dehināṃ

sādhoḥ svamohaprabhavāḥ kutaḥ pare|| 11

अर्थ

जो लोग अपना सर्वस्व लूटनेवाले इन छः इन्द्रियरूपी डाकुओंपर तो पहले विजय नहीं प्राप्त करते और ऐसा मानने लगते हैं कि हमने दसों दिशाएँ जीत लीं, वे मूर्ख हैं। हाँ, जिस ज्ञानी एवं जितेन्द्रिय महात्माने समस्त प्राणियोंके प्रति समताका भाव प्राप्त कर लिया, उसके अज्ञानसे पैदा होनेवाले काम-क्रोधादि शत्रु भी मर-मिट जाते हैं; फिर बाहरके शत्रु तो रहें ही कैसे॥ ११॥✎ 605 606

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #605 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #606 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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