जिस समय हिरण्यकशिपु शब्द करनेवालेकी इधर-उधर खोज कर रहा था, उसी समय खंभेके भीतरसे निकलते हुए उस अद्भुत प्राणीको उसने देखा। वह सोचने लगा—अहो, यह न तो मनुष्य है और न पशु; फिर यह नृसिंहके रूपमें कौन-सा अलौकिक जीव है!॥ १९॥✎ 607
स सत्त्वमेनं परितोऽपि पश्यन्
स्तम्भस्य मध्यादनु निर्जिहानम्।
नायं मृगो नापि नरो विचित्र-
महो किमेतन्नृमृगेन्द्ररूपम्॥ १९
जिस समय हिरण्यकशिपु शब्द करनेवालेकी इधर-उधर खोज कर रहा था, उसी समय खंभेके भीतरसे निकलते हुए उस अद्भुत प्राणीको उसने देखा। वह सोचने लगा—अहो, यह न तो मनुष्य है और न पशु; फिर यह नृसिंहके रूपमें कौन-सा अलौकिक जीव है!॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.8.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 850) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/8/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#607 शब्दोंके बीचका स्थान: नृसिंहभगवान् पर → नृसिंहभगवान्पर