श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.8.19

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

स सत्त्वमेनं परितोऽपि पश्यन्

स्तम्भस्य मध्यादनु निर्जिहानम्।

नायं मृगो नापि नरो विचित्र-

महो किमेतन्‍नृमृगेन्द्ररूपम्॥ १९

sa sattvamenaṃ parito'pi paśyan

stambhasya madhyādanu nirjihānam|

nāyaṃ mṛgo nāpi naro vicitra-

maho kimetannṛmṛgendrarūpam|| 19

अर्थ

जिस समय हिरण्यकशिपु शब्द करनेवालेकी इधर-उधर खोज कर रहा था, उसी समय खंभेके भीतरसे निकलते हुए उस अद्भुत प्राणीको उसने देखा। वह सोचने लगा—अहो, यह न तो मनुष्य है और न पशु; फिर यह नृसिंहके रूपमें कौन-सा अलौकिक जीव है!॥ १९॥✎ 607

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #607 शब्दोंके बीचका स्थान: नृसिंहभगवान् पर → नृसिंहभगवान्‌पर

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें