मनुओंने कहा—देवाधिदेव! हम आपके आज्ञाकारी मनु हैं। इस दैत्यने हमलोगोंकी धर्ममर्यादा भंग कर दी थी। आपने उस दुष्टको मारकर बड़ा उपकार किया है। प्रभो! हम आपके सेवक हैं। आज्ञा कीजिये, हम आपकी क्या सेवा करें?॥ ४८॥
मनवो वयं तव निदेशकारिणो
दितिजेन देव परिभूतसेतवः।
भवता खलः स उपसंहृतः प्रभो
करवाम ते किमनुशाधि किङ्करान्॥ ४८
मनुओंने कहा—देवाधिदेव! हम आपके आज्ञाकारी मनु हैं। इस दैत्यने हमलोगोंकी धर्ममर्यादा भंग कर दी थी। आपने उस दुष्टको मारकर बड़ा उपकार किया है। प्रभो! हम आपके सेवक हैं। आज्ञा कीजिये, हम आपकी क्या सेवा करें?॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.8.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 855) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/8/48/