श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.12

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तस्मादहं विगतविक्लव ईश्‍वरस्य

सर्वात्मना महि गृणामि यथामनीषम्।

नीचोऽजया गुणविसर्गमनुप्रविष्टः

पूयेत येन हि पुमाननुवर्णितेन॥ १२

tasmādahaṃ vigataviklava īśvarasya

sarvātmanā mahi gṛṇāmi yathāmanīṣam|

nīco'jayā guṇavisargamanupraviṣṭaḥ

pūyeta yena hi pumānanuvarṇitena|| 12

अर्थ

इसलिये सर्वथा अयोग्य और अनधिकारी होनेपर भी मैं बिना किसी शंकाके अपनी बुद्धिके अनुसार सब प्रकारसे भगवान्‌की महिमाका वर्णन कर रहा हूँ। इस महिमाके गानका ही ऐसा प्रभाव है कि अविद्यावश संसारचक्रमें पड़ा हुआ जीव तत्काल पवित्र हो जाता है॥ १२॥✎ 621

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #621 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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