॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.9.17
यस्मात् प्रियाप्रियवियोगसयोगजन्म-
शोकाग्निना सकलयोनिषु दह्यमानः।
दुःखौषधं तदपि दुःखमतद्धियाहं
भूमन्भ्रमामि वद मे तव दास्ययोगम्॥ १७
yasmāt priyāpriyaviyogasayogajanma-
śokāgninā sakalayoniṣu dahyamānaḥ|
duḥkhauṣadhaṃ tadapi duḥkhamataddhiyāhaṃ
bhūmanbhramāmi vada me tava dāsyayogam|| 17
अर्थ
अनन्त! मैं जिन-जिन योनियोंमें गया, उन सभी योनियोंमें प्रियके वियोग और अप्रियके संयोगसे होनेवाले शोककी आगमें झुलसता रहा। उन दुःखोंको मिटानेकी जो दवा है, वह भी दुःखरूप ही है। मैं न जाने कबसे अपनेसे अतिरिक्त वस्तुओंको आत्मा समझकर इधर-उधर भटक रहा हूँ। अब आप ऐसा साधन बतलाइये जिससे कि आपकी सेवा-भक्ति प्राप्त कर सकूँ॥ १७॥