श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.19

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

बालस्य नेह शरणं पितरौ नृसिंह

नार्तस्य चागदमुदन्वति मञ्जतो नौः।

तप्तस्य तत्प्रतिविधिर्य इहाज्जसेष्ट-

स्तावद् विभो तनुभृतां त्वदुपेक्षितानाम्॥ १९

bālasya neha śaraṇaṃ pitarau nṛsiṃha

nārtasya cāgadamudanvati mañjato nauḥ|

taptasya tatpratividhirya ihājjaseṣṭa-

stāvad vibho tanubhṛtāṃ tvadupekṣitānām|| 19

अर्थ

भगवान् नृसिंह! इस लोकमें दुःखी जीवोंका दुःख मिटानेके लिये जो उपाय माना जाता है, वह आपके उपेक्षा करनेपर एक क्षणके लिये ही होता है। यहाँतक कि मा-बाप बालककी रक्षा नहीं कर सकते, ओषधि रोग नहीं मिटा सकती और समुद्रमें डूबते हुएको नौका नहीं बचा सकती॥ १९॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें