॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.9.25
कुत्राशिषः श्रुतिसुखा मृगतृष्णिरूपाः
क्वेदं कलेवरमशेषरुजां विरोहः१।
निर्विद्यते न तु जनो यदपीति विद्वान्
कामानलं मधुलवैः शमयन्दुरापैः॥ २५
kutrāśiṣaḥ śrutisukhā mṛgatṛṣṇirūpāḥ
kvedaṃ kalevaramaśeṣarujāṃ virohaḥ|
nirvidyate na tu jano yadapīti vidvān
kāmānalaṃ madhulavaiḥ śamayandurāpaiḥ|| 25
अर्थ
विषयभोगकी बातें सुननेमें ही अच्छी लगती हैं, वास्तवमें वे मृगतृष्णाके जलके समान नितान्त असत्य हैं और यह शरीर भी, जिससे वे भोग भोगे जाते हैं, अगणित रोगोंका उद्गमस्थान है। कहाँ वे मिथ्या विषयभोग और कहाँ यह रोगयुक्त शरीर! इन दोनोंकी क्षणभंगुरता और असारता जानकर भी मनुष्य इनसे विरक्त नहीं होता। वह कठिनाईसे प्राप्त होनेवाले भोगके नन्हें-नन्हें मधुविन्दुओंसे अपनी कामनाकी आग बुझानेकी चेष्टा करता है!॥ २५॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—विमोहः।