॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.9.31
त्वं वा इदं सदसदीश भवांस्ततोऽन्यो
माया यदात्मपरबुद्धिरियं ह्यपार्था।
यद् यस्य जन्म निधनं स्थितिरीक्षणं च
तद् वै तदेव वसुकालवदष्टितर्वोः॥ ३१
tvaṃ vā idaṃ sadasadīśa bhavāṃstato'nyo
māyā yadātmaparabuddhiriyaṃ hyapārthā|
yad yasya janma nidhanaṃ sthitirīkṣaṇaṃ ca
tad vai tadeva vasukālavadaṣṭitarvoḥ|| 31
अर्थ
भगवन्! यह जो कुछ कार्य-कारणके रूपमें प्रतीत हो रहा है, वह सब आप ही हैं और इससे भिन्न भी आप ही हैं। अपने-परायेका भेद-भाव तो अर्थहीन शब्दोंकी माया है; क्योंकि जिससे जिसका जन्म, स्थिति, लय और प्रकाश होता है, वह उसका स्वरूप ही होता है—जैसे बीज और वृक्ष कारण और कार्यकी दृष्टिसे भिन्न-भिन्न हैं, तो भी गन्ध-तन्मात्रकी दृष्टिसे दोनों एक ही हैं॥ ३१॥