॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.9.33
तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्या
सञ्चोदितप्रकृतिधर्मण आत्मगूढम्।
अम्भस्यनन्तशयनाद् विरमत्समाधे-
र्नाभेरभूत् स्वकणिकावटवन्महाब्जम्॥ ३३
tasyaiva te vapuridaṃ nijakālaśaktyā
sañcoditaprakṛtidharmaṇa ātmagūḍham|
ambhasyanantaśayanād viramatsamādhe-
rnābherabhūt svakaṇikāvaṭavanmahābjam|| 33
अर्थ
आप अपनी कालशक्तिसे प्रकृतिके गुणोंको प्रेरित करते हैं, इसलिये यह ब्रह्माण्ड आपका ही शरीर है। पहले यह आपमें ही लीन था। जब प्रलयकालीन जलके भीतर शेषशय्यापर शयन करनेवाले आपने योगनिद्राकी समाधि त्याग दी, तब वटके बीजसे विशाल वृक्षके समान आपकी नाभिसे ब्रह्माण्डकमल उत्पन्न हुआ॥ ३३॥✎ 1917