श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.36

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

एवं सहस्रवदनाङ्‌घ्रिशिरःकरोरु-

नासास्यकर्णनयनाभरणायुधाढ्यम्।

मायामयं सदुपलक्षितसंनिवेशं

दृष्ट्वा महापुरुषमाप मुदं विरिञ्चः॥ ३६

evaṃ sahasravadanāṅghriśiraḥkaroru-

nāsāsyakarṇanayanābharaṇāyudhāḍhyam|

māyāmayaṃ sadupalakṣitasaṃniveśaṃ

dṛṣṭvā mahāpuruṣamāpa mudaṃ viriñcaḥ|| 36

अर्थ

विराट् पुरुष सहस्रों मुख, चरण, सिर, हाथ, जंघा, नासिका, मुख, कान, नेत्र, आभूषण और आयुधोंसे सम्पन्‍न था। चौदहों लोक उसके विभिन्‍न अंगोंके रूपमें शोभायमान थे। वह भगवान्‌की एक लीलामयी मूर्ति थी। उसे देखकर ब्रह्माजीको बड़ा आनन्द हुआ॥ ३६॥✎ 622

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #622 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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