श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.41

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

एवं स्वकर्मपतितं भववैतरण्या-

मन्योन्यजन्ममरणाशनभीतभीतम् ।

पश्यञ्जनं स्वपरविग्रहवैरमैत्रं

हन्तेति पारचर पीपृहि मूढमद्य॥ ४१

evaṃ svakarmapatitaṃ bhavavaitaraṇyā-

manyonyajanmamaraṇāśanabhītabhītam |

paśyañjanaṃ svaparavigrahavairamaitraṃ

hanteti pāracara pīpṛhi mūḍhamadya|| 41

अर्थ

इस प्रकार यह जीव अपने कर्मोंके बन्धनमें पड़कर इस संसाररूप वैतरणी नदीमें गिरा हुआ है। जन्मसे मृत्यु, मृत्युसे जन्म और दोनोंके द्वारा कर्मभोग करते-करते यह भयभीत हो गया है। यह अपना है, यह पराया है—इस प्रकारके भेद-भावसे युक्त होकर किसीसे मित्रता करता है तो किसीसे शत्रुता। आप इस मूढ़ जीव-जातिकी यह दुर्दशा देखकर करुणासे द्रवित हो जाइये। इस भव-नदीसे सर्वदा पार रहनेवाले भगवन्! इन प्राणियोंको भी अब पार लगा दीजिये॥ ४१॥

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