श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.45

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यन्मैथुनादि गृहमेधिसुखं हि तुच्छं

कण्डूयनेन करयोरिव दुःखदुःखम्।

तृप्यन्ति नेह कृपणा बहुदुःखभाजः

कण्डूतिवन्मनसिजं विषहेत धीरः॥ ४५

yanmaithunādi gṛhamedhisukhaṃ hi tucchaṃ

kaṇḍūyanena karayoriva duḥkhaduḥkham|

tṛpyanti neha kṛpaṇā bahuduḥkhabhājaḥ

kaṇḍūtivanmanasijaṃ viṣaheta dhīraḥ|| 45

अर्थ

घरमें फँसे हुए लोगोंको जो मैथुन आदिका सुख मिलता है, वह अत्यन्त तुच्छ एवं दुःखरूप ही है—जैसे कोई दोनों हाथोंसे खुजला रहा हो तो उस खुजलीमें पहले उसे कुछ थोड़ा-सा सुख मालूम पड़ता है, परन्तु पीछेसे दुःख-ही-दुःख होता है। किंतु ये भूले हुए अज्ञानी मनुष्य बहुत दुःख भोगनेपर भी इन विषयोंसे अघाते नहीं। इसके विपरीत धीर पुरुष जैसे खुजलाहटको सह लेते हैं, वैसे ही कामादि वेगोंको भी सह लेते हैं। सहनेसे ही उनका नाश होता है॥ ४५॥

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