श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.9.5

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

स्वपादमूले पतितं तमर्भकं

विलोक्य देवः कृपया परिप्लुतः।

उत्थाप्य तच्छीर्ष्ण्यदधात् कराम्बुजं

कालाहिवित्रस्तधियां२ कृताभयम्॥ ५

svapādamūle patitaṃ tamarbhakaṃ

vilokya devaḥ kṛpayā pariplutaḥ|

utthāpya tacchīrṣṇyadadhāt karāmbujaṃ

kālāhivitrastadhiyāṃ kṛtābhayam|| 5

अर्थ

नृसिंहभगवान्‌ने देखा कि नन्हा-सा बालक मेरे चरणोंके पास पड़ा हुआ है। उनका हृदय दयासे भर गया। उन्होंने प्रह्लादको उठाकर उनके सिरपर अपना वह करकमल रख दिया, जो कालसर्पसे भयभीत पुरुषोंको अभयदान करनेवाला है॥ ५॥✎ 618

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—हिनिर्दष्टधि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 857)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #618 शब्दोंके बीचका स्थान: नृसिंहभगवान् ने → नृसिंहभगवान्‌ने

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