॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.9.50
तत् तेऽर्हत्तम नमःस्तुतिकर्मपूजाः
कर्म स्मृतिश्चरणयोः श्रवणं कथायाम्।
संसेवया त्वयि विनेति षडङ्गया किं
भक्तिं जनः परमहंसगतौ लभेत॥ ५०
tat te'rhattama namaḥstutikarmapūjāḥ
karma smṛtiścaraṇayoḥ śravaṇaṃ kathāyām|
saṃsevayā tvayi vineti ṣaḍaṅgayā kiṃ
bhaktiṃ janaḥ paramahaṃsagatau labheta|| 50
अर्थ
परम पूज्य! आपकी सेवाके छः अंग हैं—नमस्कार, स्तुति, समस्त कर्मोंका समर्पण, सेवा-पूजा, चरणकमलोंका चिन्तन और लीला-कथाका श्रवण। इस षडंगसेवाके बिना आपके चरणकमलोंकी भक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है? और भक्तिके बिना आपकी प्राप्ति कैसे होगी? प्रभो! आप तो अपने परम प्रिय भक्तजनोंके, परमहंसोंके ही सर्वस्व हैं॥ ५०॥