॥ श्रीहरिः ॥
तत्र श्रद्धा मनोः पत्नी होतारं समयाचत।
दुहित्रर्थमुपागम्य प्रणिपत्य पयोव्रता॥ १४
tatra śraddhā manoḥ patnī hotāraṃ samayācata|
duhitrarthamupāgamya praṇipatya payovratā|| 14
अर्थ
यज्ञके आरम्भमें केवल दूध पीकर रहनेवाली वैवस्वत मनुकी धर्मपत्नी श्रद्धाने अपने होताके पास जाकर प्रणामपूर्वक याचना की कि मुझे कन्या ही प्राप्त हो॥ १४॥
तत्र श्रद्धा मनोः पत्नी होतारं समयाचत।
दुहित्रर्थमुपागम्य प्रणिपत्य पयोव्रता॥ १४
यज्ञके आरम्भमें केवल दूध पीकर रहनेवाली वैवस्वत मनुकी धर्मपत्नी श्रद्धाने अपने होताके पास जाकर प्रणामपूर्वक याचना की कि मुझे कन्या ही प्राप्त हो॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.1.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 8) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/1/14/