श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.1.33

नवम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तत ऊर्ध्वं वनं तद् वै पुरुषा वर्जयन्ति हि।

सा चानुचरसंयुक्ता विचचार वनाद् वनम्॥ ३३

tata ūrdhvaṃ vanaṃ tad vai puruṣā varjayanti hi|

sā cānucarasaṃyuktā vicacāra vanād vanam|| 33

अर्थ

परीक्षित्! तभीसे पुरुष उस स्थानमें प्रवेश नहीं करते। अब सुद्युम्‍न स्त्री हो गये थे। इसलिये वे अपने स्त्री बने हुए अनुचरोंके साथ एक वनसे दूसरे वनमें विचरने लगे॥ ३३॥

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